इंग्लैंड की कर्फ्यू की उलझन का एक ही इलाज, जीत और सिर्फ जीत

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इंग्लैंड क्रिकेट में पिछले कुछ महीनों से एक सवाल बार-बार सामने आ रहा है कि खिलाड़ियों को रात में कितनी देर तक बाहर रहने की अनुमति होनी चाहिए। कर्फ्यू लगाया जाए या उसे पूरी तरह हटा दिया जाए, शराब को लेकर सख्ती हो या खिलाड़ियों को अपनी जिम्मेदारी खुद तय करने दी जाए, इस मुद्दे पर टीम का रुख कई बार बदल चुका है।

लेकिन इस पूरी बहस के बीच सबसे जरूरी बात शायद कुछ और है। इंग्लैंड की पुरुष टेस्ट टीम को अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा वापस हासिल करने के लिए मैदान पर जीत चाहिए। नियमों में बदलाव से ज्यादा जरूरी है कि टीम के नतीजों में बदलाव दिखाई दे।

पुराना दौर

2017 में जब जो रूट इंग्लैंड के कप्तान बने थे, तब भी टीम अनुशासन और खिलाड़ियों के मैदान से बाहर के व्यवहार को लेकर चर्चा में थी। उस समय रूट ने कहा था कि खिलाड़ी बड़े हो चुके हैं और उन्हें पता है कि किस तरह व्यवहार करना है।

उस दौर में बेन स्टोक्स ब्रिस्टल नाइट क्लब के बाहर हुई घटना के कारण एशेज दौरे से बाहर थे। जॉनी बेयरस्टो और कैमरन बैनक्रॉफ्ट से जुड़ा कथित विवाद भी सामने आया था। मोईन अली से तो एक पत्रकार ने यह तक सवाल कर दिया था कि क्या इंग्लैंड के खिलाड़ी पब से दूर रह पाएंगे।

उस समय लागू किया गया आधी रात का कर्फ्यू 2022 तक चलता रहा। अब कई साल बाद वही बहस नए रूप में फिर इंग्लैंड क्रिकेट के सामने खड़ी है।

नया नियम

हालिया विवादों के बाद जनवरी में इंग्लैंड की सफेद गेंद वाली टीम के लिए कर्फ्यू लागू किया गया। घरेलू टेस्ट समर की शुरुआत में यही व्यवस्था टेस्ट टीम पर भी लागू कर दी गई।

पहले टेस्ट के बाद बेन स्टोक्स और गस एटकिंसन के कर्फ्यू तोड़ने की खबर सामने आई। इसके बाद क्रिकेट निदेशक रॉब की ने सख्त रुख अपनाया और यहां तक कहा कि जरूरत पड़ने पर खिलाड़ियों के लिए पूरी तरह शराब प्रतिबंध पर भी विचार किया जा सकता है।

हालांकि, मामला बाद में उतना सीधा नहीं रहा। एटकिंसन को कथित तौर पर कर्फ्यू के नियम की पूरी जानकारी नहीं थी और मुख्य कोच ब्रेंडन मैक्कुलम ने भी नियमों में कुछ अस्पष्टता होने की बात मानी। अंततः स्टोक्स और एटकिंसन को किसी गलत काम का दोषी नहीं माना गया।

यू-टर्न

पिछले महीने इंग्लैंड ने खिलाड़ियों के लिए नए दिशानिर्देश जारी किए थे। कर्फ्यू बरकरार रखा गया और मैच से पहले, मैच के दौरान तथा मैच के तुरंत बाद शराब से बचने की सलाह दी गई।

इसके बाद टेस्ट क्रिकेट में एक और बड़ा बदलाव हुआ। ब्रेंडन मैक्कुलम को टेस्ट कोच के पद से हटा दिया गया। दोनों प्रारूपों की टीमों की जिम्मेदारी संभालने के दौरान उनका आखिरी बड़ा फैसला भारत के खिलाफ T20 सीरीज जीतने के बाद खिलाड़ियों को जश्न मनाने की अधिक स्वतंत्रता देना था।

अब टेस्ट कप्तान जो रूट और नए टेस्ट कोच स्टीफन फ्लेमिंग के नेतृत्व में कर्फ्यू हटा दिया गया है। सफेद गेंद की टीम से भी यह प्रतिबंध हट चुका है, जहां मैक्कुलम और हैरी ब्रूक की भूमिका बनी हुई है।

जिम्मेदारी

कर्फ्यू हटाने का फैसला मूल रूप से खिलाड़ियों को वयस्क मानते हुए उन्हें अपनी जिम्मेदारी खुद लेने का मौका देना है। मैक्कुलम भी इस सोच के समर्थक रहे हैं कि खिलाड़ियों को अपने व्यवहार और फैसलों की जिम्मेदारी खुद उठानी चाहिए।

लेकिन यहां सवाल यह है कि अगर खिलाड़ियों पर इतना भरोसा किया जा सकता है, तो कर्फ्यू लगाने की जरूरत ही क्यों पड़ी थी। शायद इस पूरे विवाद का जवाब किसी एक नियम में नहीं, बल्कि टीम के भीतर जिम्मेदारी और भरोसे की संस्कृति में छिपा है।

बेन स्टोक्स ने भी हाल में उस धारणा को खारिज किया कि इंग्लैंड की टीम की कोई खास drinking culture है। उनका कहना था कि पूरे क्रिकेट खेल का शराब के साथ रिश्ता ऐसा नहीं है जिसे सामान्य या आदर्श माना जाना चाहिए।

पुरानी परंपरा

क्रिकेट और शराब का रिश्ता हालांकि नया नहीं है। 2022 में ट्रेंट ब्रिज में न्यूजीलैंड के खिलाफ शानदार जीत के बाद इंग्लैंड के खिलाड़ियों ने ड्रेसिंग रूम की बालकनी में जश्न मनाया था और बाद में देर रात तक पार्टी भी हुई।

2005 की ऐतिहासिक एशेज जीत के बाद एंड्रयू फ्लिंटॉफ और बाकी खिलाड़ियों के जश्न की तस्वीरें आज भी क्रिकेट प्रशंसकों को याद हैं। लेकिन उस दौर और आज के पेशेवर क्रिकेट में बड़ा अंतर है। अब खिलाड़ियों की फिटनेस, रिकवरी, प्रदर्शन और सार्वजनिक छवि पहले से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हैं।

इसी वजह से पुराने दौर के इयान बॉथम, एलन लैम्ब या फिल टफनेल के उदाहरण देकर आज के खिलाड़ियों के व्यवहार को सही ठहराना आसान नहीं है। आधुनिक क्रिकेट में खिलाड़ियों की जिम्मेदारियां और दबाव दोनों काफी बढ़ चुके हैं।

क्रिकेट संस्कृति

शराब के साथ क्रिकेट का रिश्ता सिर्फ अंतरराष्ट्रीय टीमों तक सीमित नहीं है। इंग्लैंड में क्लब क्रिकेट और पब संस्कृति लंबे समय से एक-दूसरे से जुड़े रहे हैं। मैच के बाद खिलाड़ियों का साथ बैठना और जश्न मनाना कई क्लबों की पुरानी परंपरा रही है।

लेकिन पेशेवर क्रिकेट में परिस्थितियां अलग हैं। खिलाड़ी लगातार यात्रा करते हैं, अलग-अलग फॉर्मेट में मुकाबले खेलते हैं और हर प्रदर्शन पर बारीकी से नजर रखी जाती है। ऐसे में मैदान के बाहर लिया गया कोई फैसला भी उनके अगले मैच और पूरी टीम की तैयारी को प्रभावित कर सकता है।

इसलिए खिलाड़ियों को आजादी देना गलत नहीं है, लेकिन उसके साथ जिम्मेदारी और पेशेवर सोच भी उतनी ही जरूरी है।

असली समस्या

इंग्लैंड की सबसे बड़ी समस्या वास्तव में कर्फ्यू नहीं है। असली चिंता टेस्ट क्रिकेट में टीम के नतीजे हैं। इंग्लैंड ने अपने पिछले 10 टेस्ट मैचों में सिर्फ दो जीत हासिल की हैं और यही रिकॉर्ड टीम पर सबसे ज्यादा सवाल खड़े करता है।

अगर इंग्लैंड लगातार टेस्ट मैच और सीरीज जीत रहा होता, तो शायद खिलाड़ियों के देर रात बाहर रहने या कर्फ्यू को लेकर इतनी चर्चा नहीं होती। अच्छे नतीजे अक्सर मैदान के बाहर के छोटे विवादों को अपने आप पीछे छोड़ देते हैं।

इसीलिए टीम की प्रतिष्ठा वापस लाने का सबसे प्रभावी तरीका कोई नया नियम लागू करना नहीं, बल्कि स्कोरबोर्ड पर लगातार जीत दर्ज करना है।

आगे की चुनौती

इंग्लैंड के पास खुद को साबित करने का पहला बड़ा मौका पाकिस्तान के खिलाफ तीन टेस्ट मैचों की सीरीज में आएगा। इसके बाद टीम का कार्यक्रम और मुश्किल होने वाला है।

सर्दियों में इंग्लैंड को विश्व टेस्ट चैंपियन दक्षिण अफ्रीका का दौरा करना है। इसके बाद अगले साल घरेलू मैदान पर ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ एशेज सीरीज होगी। 2028 की शुरुआत में भारत के दौरे पर पांच टेस्ट मैचों की चुनौती भी सामने होगी।

इन मुकाबलों में सफलता हासिल करने के लिए इंग्लैंड को सिर्फ सही नियमों की जरूरत नहीं होगी। टीम को फिटनेस, मानसिक मजबूती, अनुशासन और सबसे ज्यादा लगातार अच्छा क्रिकेट खेलने की जरूरत होगी।

जीत ही इलाज

कर्फ्यू हटने से खिलाड़ियों को अधिक स्वतंत्रता जरूर मिलेगी और उन्हें यह महसूस हो सकता है कि टीम मैनेजमेंट उन पर भरोसा कर रहा है। लेकिन यह फैसला अपने आप में जीत की गारंटी नहीं है।

जो रूट की पुरानी बात आज भी प्रासंगिक है कि अगर खिलाड़ियों से मैदान पर जिम्मेदारी लेने की उम्मीद की जाती है, तो उन्हें मैदान के बाहर भी समझदारी से फैसले लेने का भरोसा दिया जाना चाहिए। अब उस भरोसे को सही साबित करने की जिम्मेदारी खिलाड़ियों की है।

इंग्लैंड क्रिकेट को बार-बार नियम बदलने के बजाय खिलाड़ियों के लिए एक स्पष्ट नीति बनाकर उस पर कायम रहना होगा। लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है कि टीम टेस्ट क्रिकेट में जीतना शुरू करे। कर्फ्यू हो या न हो, इंग्लैंड अपनी खोई प्रतिष्ठा बार में नहीं, बल्कि टेस्ट मैचों, सीरीज और ट्रॉफियों में वापस हासिल कर सकता है। जीत आएगी, तो बाकी सारी बहस अपने आप छोटी हो जाएगी।

FAQs

इंग्लैंड का कर्फ्यू क्यों चर्चा में है?

टीम ने हाल में कर्फ्यू लगाया और फिर उसे हटा दिया।

कर्फ्यू किसने हटाया?

कर्फ्यू रूट और स्टीफन फ्लेमिंग के दौर में हटा।

इंग्लैंड ने पिछले 10 टेस्ट में कितने जीते?

इंग्लैंड की अगली टेस्ट सीरीज किससे है?

इंग्लैंड की अगली टेस्ट सीरीज पाकिस्तान से है।

इंग्लैंड को कर्फ्यू के बाद क्या चाहिए?

टीम को मैदान पर लगातार जीत और अच्छे नतीजे चाहिए।

Ehtesham Arif

I’m Ehtesham Arif, lead cricket analyst at Kricket Wala with over 3 years of experience in cricket journalism. I’m passionate about bringing you reliable match analysis and the latest updates from the world of cricket. My favorite team is India, and in the IPL, I support Delhi Capitals.

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