क्रिकेट की दुनिया में खिलाड़ियों और बोर्ड्स के बीच पावर बैलेंस हमेशा से थोड़ा एकतरफा रहा है। लेकिन हाल ही में साउथ अफ्रीका के स्पिनर टबरेज़ शम्सी का NOC विवाद एक ऐसा केस बन गया है जिसने इस परंपरा को सीधे चुनौती दी है।
क्या हुआ था मामला?
शम्सी SA20 लीग के लिए तो ड्राफ्ट में थे लेकिन बाद में खुद को हटा लिया। इसके बाद उन्होंने UAE की ILT20 लीग में खेलने का फैसला किया। हालांकि CSA ने उन्हें NOC तो दिया, लेकिन सिर्फ उतने ही दिनों का, जितने SA20 लीग की विंडो को कवर करता था। यानी, भले ही शम्सी SA20 नहीं खेल रहे थे, पर फिर भी ILT20 पूरी नहीं खेल सकते थे।
कोर्ट पहुंचे शम्सी
शम्सी ने इस एकतरफा फैसले के खिलाफ हाई कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया। कोर्ट ने फैसला सुनाया कि शम्सी ILT20 पूरी खेल सकते हैं और CSA को उनके लीगल खर्च भी भरने होंगे। ये फैसला भले ही अंतरिम था, लेकिन इसका मैसेज बेहद साफ था – “बिना कॉन्ट्रैक्ट के, बोर्ड की मनमानी नहीं चलेगी।”
क्यों है ये मामला खास?
ये सिर्फ एक खिलाड़ी की लड़ाई नहीं थी। ये उन तमाम खिलाड़ियों के हक़ की बात थी जो सेंट्रल कॉन्ट्रैक्ट में नहीं हैं, या जिन्होंने घरेलू जिम्मेदारियां पूरी कर ली हैं और अब अपना करियर ग्लोबल लीग्स में तलाश रहे हैं।
NOC की ताकत
क्रिकेट बोर्ड्स लंबे समय से NOC (No Objection Certificate) को एक टूल की तरह इस्तेमाल करते रहे हैं, जिससे वो तय कर सकें कि खिलाड़ी कहां खेल सकते हैं और कहां नहीं। लेकिन शम्सी का केस दिखाता है कि ये टूल अब हर मौके पर कारगर नहीं है, खासकर जब खिलाड़ी कानून का सहारा लें।
भारत पर असर?
भारत में BCCI की पॉलिसी सबसे सख्त है—कोई भी एक्टिव मेल क्रिकेटर विदेशी लीग्स में नहीं खेल सकता। लेकिन शम्सी के केस से कुछ नए सवाल उठे हैं: अगर कोई खिलाड़ी सेंट्रल कॉन्ट्रैक्ट में नहीं है, और IPL में भी नहीं खेल रहा, तो क्या BCCI उसे रोक सकती है?
दूसरे देशों की पॉलिसी
इंग्लैंड में NOC मिलते हैं लेकिन लिमिटेड टाइम के लिए। पाकिस्तान में PSL को प्राथमिकता देने के लिए बाहर की लीग्स पर पाबंदी रहती है। वहीं, छोटे बोर्ड्स के पास ज्यादा ऑप्शन नहीं होते, इसलिए उनके खिलाड़ी बाहर लीग्स में खेलने को मजबूर होते हैं।
नया टेम्पलेट
अब शम्सी का केस एक मिसाल बन गया है—NOC न मिलना अब सिर्फ एक खिलाड़ी का गुस्सा नहीं, बल्कि “प्रोफेशनल अधिकारों की रक्षा” की लड़ाई मानी जा रही है। खिलाड़ियों की पहचान सिर्फ एक एथलीट की नहीं, एक फ्रीलांसर प्रोफेशनल की तरह हो रही है।
पुरानी सोच को अलविदा
अब क्रिकेट गिग इकॉनमी बन चुकी है। खिलाड़ी अलग-अलग लीग्स और देशों में जाकर खेल रहे हैं। ऐसे में बोर्ड्स का ये सोचना कि वो खिलाड़ियों के मालिक हैं—अब पुराना हो चुका है। उन्हें अब नई सोच के साथ आगे बढ़ना होगा।
ज़रूरी बदलाव
अगर बोर्ड वफादारी चाहते हैं, तो उन्हें ट्रांसपेरेंट पॉलिसी और फेयर कॉन्ट्रैक्ट देने होंगे। NOC पॉलिसी को क्लियर करना होगा और प्रोफेशनल्स की आज़ादी को समझना होगा।
शम्सी का संदेश
टबरेज़ शम्सी ने सिर्फ एक लीग में खेलने का अधिकार नहीं जीता, उन्होंने एक मैसेज दिया है—कि खिलाड़ी भी फैसले ले सकते हैं, और अब क्रिकेट की दुनिया में अधिकार सिर्फ बोर्ड्स के पास नहीं रहेगा।
FAQs
शम्सी ने CSA के खिलाफ केस क्यों किया?
NOC समय से पहले खत्म करने के खिलाफ कोर्ट गए।
क्या शम्सी सेंट्रल कॉन्ट्रैक्ट में थे?
नहीं, वे CSA के सेंट्रल कॉन्ट्रैक्ट में नहीं थे।
कोर्ट ने क्या फैसला सुनाया?
CSA को NOC बढ़ाने और खर्च उठाने का आदेश दिया।
क्या भारत में ऐसे केस हो सकते हैं?
संभावना है, खासकर फ्रिंज और अनकैप्ड खिलाड़ियों के लिए।
NOC का क्या महत्व है?
बोर्ड खिलाड़ियों की मूवमेंट को इससे नियंत्रित करते हैं।











